रिश्ते 34

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रिश्तों का सच जानना

बहुत कठिन हो जाता है,

जब रिश्तों में सरलता का

अभाव होता है।

रिश्तों का जीवट रहना,

उनके जीवित रहने से

कहीं अधिक

महत्वपूर्ण होता है।

कई बार हम

इस प्रश्न का सामना करते हैं

कि क्या रिश्ते सत्य हैं।

मुझे लगता है

सत्य को परिभाषित करना

और उसको रिश्तों में ढूँढना

बहुत ही मुश्किल है।

सत्य सत्य होता है

और रिश्ते रिश्ते होते हैं,

रिश्तों के सच को

जानने से कहीं अधिक

रिश्तों को जानना होता है,

उनके अपने स्वरूप को जानना,

बिना किसी दिमाग़ी मशक़्क़त किए,

बिना किसी गुणा-गणित के,

सहज भाव से।

रिश्ते स्वयं बोलने लगते हैं,

संवाद करने लगते हैं,

अपने जीवट होने का

प्रमाण देने लगते हैं,

रिश्ते चलते रहते हैं.

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