रिश्ते 35

Embed from Getty Images

रिश्तों का भूगोल निराला होता है
दूरियाँ या नज़दीकियाँ
उतनी महत्वपूर्ण नहीं होतीं
जितना रिश्तों को बनाये रखने का
आशय व रिश्तों में विश्यास,
हम दूर रहकर भी
रिश्ते निभाते हैं
और पास रहते हुए भी
रिश्तों को बिगाड़ लेते हैं।

रिश्तों में पारस्परिक प्रेम व स्नेह
बरकरार रहता है,
मीलों दूर रहते हुए भी।

मिलना या न मिल पाना
रिश्तों में दूरी नहीं पैदा करता
यदि रिश्तों में सम्मान भाव हो,
एक दूसरे के प्रति
सहजता व स्नेह का भाव हो।

रिश्ते दूर रहकर भी
बखूबी निभाये जा सकते हैं
यदि रिश्तों में नज़दीकियाँ हों.
ज़बरदस्ती की नज़दीकी से
सुकून की दूरी अच्छी है.
ठीक उसी प्रकार
जैसे नज़दीक रहते हुए भी
बातचीत न होना
और दूर रहते हुए भी
कुशलक्षेम जानने की
उत्सुकता होना
और
मिलने का उत्साह
जीवित रहना।

हमनें पढ़ा था

रहिमन धागा प्रेम का,
मत तोड़ो चटकाय;
टूटे से फिर ना जुड़े,
जुड़े गाँठ पड़ जाय।

एक तरफ धागे हैं
जो उलझ कर
और भी करीब आ जाते हैं
एक तरफ रिश्ते हैं
जो जरा सा उलझते ही
टूट जाते हैं।

धागे और मोती का भी रिश्ता

अमिट होता है
उनका साथ
और एक दूसरे के प्रति
कृतज्ञता का भाव
उनकी नज़दीकियाँ
नजरंदाज नहीं की जा सकतीं हैं।
सच में
रिश्तों का भूगोल निराला होता है।

===

और इनको भी पढ़ें –

Leave a Comment

Translate »